बोझिल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बाल साहित्य से अधिक सीखते हैं बच्चे


किसी तरह से उपलब्ध हो जाने पर अगर बच्चे बाल साहित्य की किताबें पढ़ते भी हैं तो उन्हें यह कहकर टोक दिया जाता है कि पहले कोर्स पर ध्यान दो. क्या बाल साहित्य कोर्स पूरा करने की राह में बाधक है? ऐसी कई सारी नकारात्मक बातें पहले से ही बाल साहित्य को लेकर प्रचलन में … Continue reading बोझिल पाठ्यपुस्तकों से नहीं, बाल साहित्य से अधिक सीखते हैं बच्चे

पुस्तकालय का बच्चों पर बहुत पड़ता है फ़र्क


हमारे समाज में अकसर बच्चों को साहित्य से वंचित रखा जाता है. जिसकी कई वजहें रही हैं. चाहे वो पाठ्य पुस्तकों का भय हो, या अन्य किताबों को पढ़ना समय की फिजूलखर्ची हो जिसका सीधा-सीधा कक्षा या परीक्षा से कोई संबंध नहीं होता, इत्यादि अनेक बाते हैं. लेकिन ऐसी कई बातों से प्रभावित होकर जब … Continue reading पुस्तकालय का बच्चों पर बहुत पड़ता है फ़र्क

एक दिन किताबों की दुनिया में जाना है


प्रत्येक बच्चे को किताबें मिलें, ये उसका अधिकार है लेकिन प्रत्येक बच्चे तक किताबें पहुँचाना और उसे उत्सुक पाठक बनाना हमारा कर्तव्य है। आये दिन आपको बहुत सारे लोग शिकायत करते हुए मिलेंगे, कि अरे भई अब वो कल्चर नही रहा जब बच्चे किताबें पढ़ें, आजकल के बच्चों के हाथ में आपको मोबाइल और गेम्स … Continue reading एक दिन किताबों की दुनिया में जाना है

उपक्रम से पहले और उपक्रम के साथ अब तक का सफ़र


जिन दिनों मेरा स्कूल जाना शुरु हुआ, ज्यादातर बच्चों की तरह मै भी स्वभाव से बहुत चंचल थी। पर वह चंचलता शुरुआती दो कक्षाओं l.k.g और u.k.g के बाद से धीरे-धीरे खो गई।  वजह बना ‘डर’। हर समय शिक्षक मुझसे ऐसे प्रश्न पूछते जिनका जवाब मुझे नही आता था। उसके बाद या तो पिटाई होती … Continue reading उपक्रम से पहले और उपक्रम के साथ अब तक का सफ़र

कहानियों बिन सूना बचपन


साल 2010 की शुरुवाती ठंड की प्यारी सी धूप थी. जब दिल्ली की एक बस्ती के बच्चों के साथ बातचीत करने का मौका मिला. मेरे लिये ये पहला अवसर था, जब मैं बच्चों के समूह के साथ कुछ सुनने – कहने के लिये आई थी. समझ नही आ रहा था कि शुरुवात कैसे करूँ अचानक … Continue reading कहानियों बिन सूना बचपन

उन कहानीयों का रंगबिरंगा संसार


चंपावत और दिल्ली में काम करते हुए बच्चों को कहानी सुनाना एक जरूरी काम जैसे था. आठ सितम्बर दो हज़ार अठारह . जब पूरे एक साल बाद बच्चों के बीच मुझे कहानी सुनाने के लिये जाना था. थोड़ी घबराहट और ज्यादा खुशी अंदर ही अंदर किसी खरगोश की तरह उछाल मार रही थी. डर लग … Continue reading उन कहानीयों का रंगबिरंगा संसार