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उपक्रम से पहले और उपक्रम के साथ अब तक का सफ़र

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जिन दिनों मेरा स्कूल जाना शुरु हुआ, ज्यादातर बच्चों की तरह मै भी स्वभाव से बहुत चंचल थी। पर वह चंचलता शुरुआती दो कक्षाओं l.k.g और u.k.g के बाद से धीरे-धीरे खो गई।  वजह बना ‘डर’। हर समय शिक्षक मुझसे ऐसे प्रश्न पूछते जिनका जवाब मुझे नही आता था। उसके बाद या तो पिटाई होती या फिर ढेर सारा अपमान।  मैं हिम्मत नहीं जुटा पाती थी, कि यह पूछ सकूँ, मैडम, मे आई गो टू टॉयलेट? मैंने बैठे-बैठे ही पेशाब कर दिया। कक्षा एक तक पढ़ने के लिए मुझे किसी शिक्षक पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि मम्मी मुझे संभाल लेती थीं। लेकिन धीरे-धीरे सामाजिक विज्ञान  और विज्ञान क्या होता है, मेरी समझ के परे हो गया। पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि मैडम ये (जो मुझे ब्लैकबोर्ड से देख कर  कॉपी में लिखना था) किस कॉपी में लिखना है? मैं नहीं चाहती थी कि किसी भी शिक्षक की नज़र मुझ पर या मेरी कॉपी पर पड़े और मुझे डाँट या मार पड़े। मुझे यह स्वीकार नहीं था कि कोई मुझे कमजोर समझे। लेकिन इस बात का भी दुःख अलग से था कि कोई मुझपर ध्यान नही देता। मुझे एक्स्ट्रा अटेंशन की जरूरत थी और आज भी कहीं न कहीं यही इच्छा है। घर में आने वाले मेहमान हमेशा स्कूल और पढ़ाई के संबंध में पूछताछ करते थे। कभी इसकी स्पेलिंग कभी उसकी स्पेलिंग एक तरह से जंग छिड़ी होती थी कि कब तक तुम जवाब दे पाती हो।  मुझे भी हार बर्दाश्त नहीं थी। दोनों ही अपने अपने ज्ञान की सत्ता कायम करने पर लगे होते थे।

 जब आप स्कूल बदलते है तो वहाँ ये परीक्षा और भी कठिन हो जाती है जैसे कि अच्छा तो तुम इंग्लिश मीडियम स्कूल से हो। तुम सब इंग्लिश में करो और जब हिंदी लिखने में मात्रा की गलती हो तब तो  नए  शिक्षकों के लिए एक सुनहरा अवसर होता था कि यही सिखाया गया है तुम्हारे स्कूल में। इसका प्रभाव मेरे आत्मविश्वास और व्यवहार पर पड़ा मैं लोगो से बचने लगी, अपनी बात कहने में मुझे बहुत कठिनाई होती। जैसे-जैसे लोगो के सम्पर्क में आती गयी उनके व्यवहार ने मुझे यह मानने पर विवश कर दिया कि मुझे किसी से बात नही करनी मुझे किसी के संपर्क में नही रहना है। मैंने अपनी दुनिया अपने घर के ही अन्दर सीमित कर ली। जहाँ पर मुझे ये विश्वास दिलाया जाता कि मैं जैसी भी हूँ, अच्छी हूँ।

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 बी. एड करने के बाद मैंने पढाई छोड़ दी और 5-6 महीने घर पर बैठ गई। इस दौरान मेरे  सिर्फ तीन काम थे: खाना, सोना, सोचना कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे मुझे ख़ुशी मिले,   जहाँ मै सहजता से रह सकूं। मुझे यह विचार पहले कभी नही आया कि शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के साथ काम करना है।  एक दिन बिना कुछ सोचे समझे ही, उपक्रम के काम के बारे में जाने बिना बस समय पर सब कुछ छोड़ते हुए उपक्रम की एक कार्यशाला में सम्मिलित हुई जो भारतीय विद्या मन्दिर के शिक्षकों के साथ आयोजित की गई थी। उस कार्यशाला में सपनों के स्कूल पर चर्चा हुई। उस दिन ऐसा लगा जैसे मेरे सपनों का स्कूल यहीं-कहीं है,  जहाँ बच्चों को सहज वातावरण मिल सके। इसके बाद उपक्रम के ऑफिस में हम लोग रोज शिक्षा के विभिन्न आयामों पर गहरी चर्चा करते थे/हैं। यह धीरे-धीरे मुझे शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रेरित करने लगा।

 सबसे पहले मैंने क्लास ऑब्जरवेशन किया और रिपोर्ट बनाया, इस एक-डेढ़ महीने के दौरान मेरा अनुभव सामान्य था। जब भी कोई क्लास खाली दिखती तो मैं बच्चों के साथ बातचीत करने लगती। कक्षा तीन में पहली बार बच्चों के बीच मैं एक खेल के साथ गई। उस समय तक हम एक- दूसरे से अपरिचित थें। मेरे मन में सिर्फ सवाल ही सवाल थें। मैं सोच रही थी कि अपनी बात इनको समझा भी पाऊँगी या नहीं। इनको मेरे साथ खेल कर मज़ा आएगा कि नहीं। मैंने उन्हें खेल के नियम बताये और खेल शुरू हुआ। दस मिनट के भीतर हम एक -दुसरे के साथ कैसे घुल मिल गये पता ही नहीं चला। बच्चे अपनी बात को दृढ़ता से रखने लगे ऐसे नहीं, यहाँ नहीं, मैं यहाँ खड़ा रहूँगा| बिलकुल जादू के जैसे मेरे सारे सवाल सारी सोच एकदम से गायब हो गयी और अब सिर्फ मज़ा आ रहा था। उनके साथ जैसे मेरा बचपन लौट आया था। अवसर मिलते ही उनकी ढेर सारी बातों और अनुभवों को सुनना, अपने बचपन कि यादों को उनके साथ साझा करना, उनके साथ गाना गाना मुझे अच्छा लगने लगा | लगभग हफ्ते भर की मुलाकात में ही हम अच्छे दोस्त बन गये। जब मैं क्लास प्रैक्टिस में एक लेसन प्लान के साथ गयी तब उनके साथ इतनी आत्मीयता हो चुकी थी कि वो मेरे साथ पाठ पढ़ने के लिये आसानी से तैयार हो गये।

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 अब एक दिन भी उन बच्चो के पास न जाऊं तो कुछ अधूरा सा लगता है। आज मेरा अनुभव पहले की बातों से बिल्कुल अलग है। मैं सोचती थी कि बच्चों को संभाल नही सकती जबकि सही बात तो यह है कि बच्चों को कुछ सिखाना या संभालना नही पड़ता। वो तो बहुत कुछ जानते हैं, जो हम नही जानते। उनकी कल्पनाओं का कोई दायरा नही होता। अगर उन्हें मौका मिले तो दुनिया आविष्कारकों से भर जाये। वे बेहद सृजनशील होते हैं। बेफिक्र हो कर अपनी बात कहते हैं। वे कुछ बेहतर करना चाहते हैं। अगर कमी या देरी है तो इस बात की कि हम उन्हें समझें-सुनें और उन्हें मौके दें सरल और अनोखे संसार को गढ़ने के ताकि कोई अन्य बचपन डरा-सहमा न हो। मैं उपक्रम को धन्यवाद देना चाहती हूँ, मुझे इतने सुन्दर बच्चों के संसार में ले जा कर उसे अनुभव करने का मौका देने के लिए। मात्र पांच महीनों के भीतर मेरी दवाइयों को कम करवाने के लिये। मेरा खुद से परिचय करवाने के लिए।

– यह लेख अंजली ने लिखा है

कहानियों बिन सूना बचपन

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साल 2010 की शुरुवाती ठंड की प्यारी सी धूप थी. जब दिल्ली की एक बस्ती के बच्चों के साथ बातचीत करने का मौका मिला. मेरे लिये ये पहला अवसर था, जब मैं बच्चों के समूह के साथ कुछ सुनने – कहने के लिये आई थी. समझ नही आ रहा था कि शुरुवात कैसे करूँ अचानक याद आया कि क्यों न कोई कहानी सुनाई जाये. बचपन की याद से एक कहानी सुनाई जिसमें एक राजकुमार को उसकी सौतेली मां ने जादू से तोता बना दिया था. वह तोता दूर देश की एक राजकुमारी के पास पहुँचता और फिर कैसे दोनो में प्रेम होता है. ये कहानी सुनाने में शायद बीस मिनट का समय लगा होगा लेकिन इसके बाद जो बातचीत हुई वो लगभग तीन घंटे के करीब चली. जिसमें बच्चों ने फिर अपनी सुनी कहानियों के बारे में बताया जो इसी कहानी से मिलती-जुलती थी. फिर कहानी के कुछ मुद्दों को उठाया जैसे कि क्या वाकई में किसी इंसान को जादू से तोता बनाया जा सकता है, कुछ बच्चे कहते कि आज से सौ साल पहले ऐसा हो सकता था क्योंकि तब राजा महराजा हुआ करते थें. उस समय जादू से कुछ भी किया जा सकता था, कुछ बच्चों ने अपने आस-पास की जादू-टोने वाली कहानियाँ सुनाकर उसे साबित करने का भी प्रयास किया. कुछ बच्चों का कहना था कि कहानी में कहीं न कहीं कुछ सच जरूर होता है. कुछ बच्चों ने इसे काल्पनिक बताते हुए सिर्फ मजे के लिये सुनना-सुनाना करार दिया. तब तक मुझे कहानियों के सुनने- सुनाने के महत्व का कुछ पता नही था. दूसरी घटना वर्ष 2012 में साहित्य अकादमी के एक कार्यक्रम में बच्चों के लिये कहानी सुनाने का एक सत्र था जिसमें मॉडर्न स्कूल के बच्चे आये थें और एक पेशेवर किस्सागो ने उन्हें अंग्रे़जी में एक कहानी सुनाई. उन बच्चों ने भी कहानी उतने ही चाव से सुनी और उसपर चर्चा की जितनी कि दो साल पहले झुग्गी के उन बच्चों ने की थी. कुल मिलाकर एक कहानी ने बच्चों को कितनी सारी बातें कहने-सुनने के अवसर प्रदान किये थे. इस कहानी के माध्यम से बातचीत का सूत्र मिला. जिसने एक नये इंसान को नये बच्चों के साथ जोड़ने में मद्द की. लेकिन इस प्रक्रिया में एक और बात जो निकलकर आई वह इस तरह थी कि जब दोनो समूहो से पूछा गया कि क्या वे रोज कहानी सुनते हैं, तो सबने ‘ना’ ही मे जवाब दिया. बच्चों के साथ लगभग सात वर्षों से लगातार काम करने के दौरान मुझे एक भी बच्चा ऐसा नही मिला जो प्रतिदिन कहानियाँ सुनता हो. ये समस्या सिर्फ शहरी क्षेत्र के बच्चों के साथ ही नही थी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में भी बच्चों को कोई कहानी सुनाने वाला नही है.

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यहाँ ये सब बताने का मकसद सिर्फ यही है कि कहानियाँ किस तरह से बचपन से गायब हो रही हैं और उनका प्रभाव् किस प्रकार से बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ रहा है. घर और विद्यालय से यह संस्कृति लगभग खत्म हो चली है जबकि ये कहानियाँ शुरुवाती दौर में स्कूल आने वाले बच्चों को भाषा के विस्तार में जितनी मद्द करेंगी, उतनी ही जल्दी पढ़ने-लिखने की क्षमता का भी विस्तार करेंगी. कहानियों के माध्यम से हम भाषा के उन सभी तत्वों पर काम कर सकते हैं जिन्हे आज के समय में समग्र भाषा पद्धति कहा जाता है. जिसके अंतर्गत (LSWR) यानि सुनना, बोलना, लिखना और पढ़ना- इन सभी का इस्तेमाल बखूबी किया जां सकता है. आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्र में यदि बच्चों के साथ कहानियों पर काम हो, उनसे बातचीत की जाये तो बच्चों के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. यदि हम बच्चों को कहानियों के संसार से जोड़कर उनके पढ़ने-लिखने की क्षमता पर काम करें तो बच्चों की इस क्षमता का बेहतर विकास किया जा सकता है. उत्तराखंड के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में वर्ष 2016 मे इसी प्रकार का एक प्रयोग किया गया. शुरु के कुछ दिनों में जो बच्चे बातचीत करने में झिझक रहे थे, वे धीरे-धीरे खुलने लगे. आगे चलकर इन्ही कहानियों के माध्यम से बच्चों की पढ़ने – लिखने की समस्या का भी समाधान हुआ. यदि स्कूलो में शिक्षक बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाने की शुरुवात वर्ण-व्यंजन की जगह कहानी या कविता के माध्यम से करें तो भविष्य में बहुत हद तक बच्चों की इस समस्या को खत्म किया जा सकता है. कहानियाँ सिर्फ कल्पनाओं के दरवाजे नही खोलती, बल्कि सोचने-समझने और गहन विचार की तरफ ले जाती हैं. कहानी अपने-आपमें एक बच्चे को कई सारे भाव में ले जाती है, जहाँ वो किसी पात्र की खुशी में खुश होता है, कभी उसके दुख की पीड़ा को महसूसता है, तो कभी-कभी कठिनाइयों में उलझे पात्र को अपने सूझ-बूझ से खुद निकाल लाता है. कहानियाँ बच्चे का सिर्फ अचरज संसार नही हैं, बल्कि वे उसकी वास्तविकताओं को समझने का एक बेहतर साधन हैं.

उपक्रम के माध्यम से हम अपने आस-पास के बच्चों को उस दुनिया में ले जाना चाहते हैं, जहाँ कल्पनाओं का सुंदर संसार हकीकत की राह देख रहा है, जो उनके आस-पास से कहीं खो गई हैं.

– यह लेख किरण ने लिखा है

उन कहानीयों का रंगबिरंगा संसार

A girl running away from a cloud of waste

चंपावत और दिल्ली में काम करते हुए बच्चों को कहानी सुनाना एक जरूरी काम जैसे था. आठ सितम्बर दो हज़ार अठारह . जब पूरे एक साल बाद बच्चों के बीच मुझे कहानी सुनाने के लिये जाना था. थोड़ी घबराहट और ज्यादा खुशी अंदर ही अंदर किसी खरगोश की तरह उछाल मार रही थी. डर लग रहा था, इतने दिनों बाद बच्चों के साथ जुड़ना होगा लेकिन पता नही बच्चों को मेरा कहानी सुनाना पसंद आयेगा या नहीं. खुशी इस बात की भी थी कि इस क्रम में मेरा वह स्कूल भारतीय विद्या मंदिर भी था जहाँ मैंने ज़िन्दगी का पहला सबक सीखा.

मेरा पहला पड़ाव था, प्राथमिक विद्यालय, परासपानी सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) जहाँ बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी कहानी सुनने का इंतज़ार कर रहे थें. खास बात इस स्कूल की यह थी कि सभी बच्चे आदिवासी समुदाय् से आते हैं. यहाँ कक्षा चौथी और पाँचवीं के पैसठ बच्चे थें. सबसे पहले बच्चों को अपना परिचय देते हुए मैंने उनसे पूछा कि आप लोग कहानीं तो रोज सुनते होंगे. मेरे विश्वास के उलट उनका जवाब ना में आया. मैंने ‘कचरे का बादल’ कहानी सुनाई. यह एक ऐसी बच्ची की कहानी थी जो हमेशा गंदगी फैलाती रहती थी, कहानी शुरु करने से पहले मैंने कहानी का परिचय दे दिया था. कहानी के बीच-बीच में बातचीत भी होती रही, ताकि बच्चों की भी भागीदारी बनी रहे लेकिन बच्चे ज्यादा से ज्यादा हाँ या ना में ही जवाब देते थें. इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन दो मुख्य कारण जो मुझे समझ आया वो था- मेरा पहले से इन बच्चों के साथ कोई परिचय न होना. दूसरा, की ये बच्चे ऐसे गांव से थें जहाँ पूरे साल में शायद ही बच्चे दो-तीन बार से अधिक बाहर के अन्य लोगों से मिलते-जुलते होंगे या वे कहीं बाहर भी जाते होंगे. इन सबके बावजूद बच्चों को कहानी अच्छी लगी और बच्चों ने अपने टीचर के माध्यम से मुझे फिर आने को कहा.

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परासपानी विद्यालय से निकलने के बाद अब मैं उस जगह की यात्रा पर थी, जहाँ से मेरे स्कूल के दिन शुरु हुए थे. भारतीय विद्या मंदिर, डाला सोनभद्र जो परास पानी गांव से लगभग सात किलोमीटर दूर था. जहाँ मेरी पहली पाठ्य पुस्तक पढ़ने की शुरुवात हुई थी. उन दिनो को याद करते हुए बहुत सारी यादें धुँधली पड़ गई थी. अब तो कोई भी पुराना शिक्षक या स्कूल स्टाफ नहीं रहा. लेकिन बच गया था स्कूल का वही पुराना नियम जो मेरे नजर में कभी भी घिसा-पिटा नही हो सकता. जिसने न जाने कितने गरीब बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाया और जहाँ आज भी करीब अस्सी प्रतिशत बच्चे फीस नही दे पाते हैं. लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा अभी भी स्कूल सम्भाल रहा है. इस स्कूल में डाला और आस-पास की बस्ती के बच्चे आते हैं. सिर्फ दस मिनट में न जाने कितनी कल्पनाओं ने ताना-बाना बुनना शुरु कर दिया था. स्कूल में सबसे पहले मैं प्रिंसिपल ऑफिस गई और थोड़ी बातचीत के बाद हम लोग उस कक्षा की तरफ बढ़ें जहाँ बच्चे हमारा इंतज़ार कर रहे थे. प्रिंसिपल ऑफिस से उस कक्षा की दूरी तय करने में मुझे हर एक कक्षा के बाहर ढेरों कचरा मिला, उसमें से कुछ चीजें उठा ली और उस कक्षा में टेबल के उपर सजा दिया. उसी कचरे के माध्यम से कहानी की भूमिका बनानी शुरु कर दी. फिर बच्चों को कहानी सुनाई. यहाँ भी बीच-बीच में बच्चों से बातचीत और सवाल-जवाब चलता रहा. लेकिन मजे की बात ये थी कि यहाँ के सभी बच्चे पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बने रहे. परास पानी गांव के उलट यह स्कूल बाज़ार में है, जहाँ आते-जाते बच्चों पर वहाँ हो रही गतिविधियों का भी असर पड़ता होगा. खैर, कहानी ख़त्म होने बाद जब बच्चों को मैंने ये बताया कि मैं भी इसी स्कूल से पढ़ी हूँ तो बच्चे बहुत खुश हुए. और मुझे हर रोज स्कूल में आने और कहानी सुनाने के लिये कहा.

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इस थोड़ी देर की मुलाकात ने बच्चों और शिक्षकों से जुड़ने में मेरी मदद की. दो दिन बाद ही दोनो स्कूल के शिक्षकों ने फोन करके अपने स्कूल में आने का फिर से न्यौता दिया. बच्चों के लिये ये एक नया अनुभव था. मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में पढ़ती थी तब कभी-कभार कोई शिक्षक नैतिक शिक्षा की किताब से कोई प्रेरणास्पद कहानियाँ सुना देता था, ताकि उसे समझकर प्रश्नों के उत्तर दिये जा सके. लेकिन इन कहानियों के माध्यम से बच्चों से जुड़ा भी जाये ऐसी कोई मंशा रही होगी, बहुत याद करने के बाद भी कुछ याद नही आता. लेकिन इन दोनों विद्यालयों के इस अनुभव के बाद और अन्य लोगों से बातचीत करने के बाद समझ आया कि कहानीयों के सुनने-सुनाने का प्रचलन गायब हो गया है, तब बड़ा ही दुख और आश्चर्य होता है. ऐसा लगता है कि हम सबने बच्चों को उस द्वीप की तरह अकेला छोड़ दिया है, जहाँ कभी-कभी किसी खास मौसम में ही यात्री आते हैं और छुट्टियाँ मनाकर उसपर कुछ कचरा छोड़ वापस चले जाते हैं. उनका उस द्वीप से न कोई लगाव होता हे और ना ही कोई संवाद. जब मुझे पता चला कि प्रथम बुक्स आठ सितम्बर यानि विश्व साक्षरता दिवस वाले दिन अलग-अलग जगहों पर हर साल लोगों को स्वैछिक रूप से तैयार करता है कि वे जहाँ भी हैं वहा के बच्चों को कहानी सुनाये तो मुझे ये कहानी वाली अवधारणा ही बड़ी रोचक लगी. दरअसल ये अवधारणा सिर्फ कहानी सुनाने तक सीमित नही है बल्कि उस कहानी के माध्यम से बच्चों के साथ एक सम्बन्ध भी जोड़ना है जो कही धीरे-धीरे खो सा रहा था. शिक्षाविद डॉक्टर कॄष्ण कुमार अपने एक व्याख्यान में कहते हैं कि ‘बच्चों को भाषा सिखानी नही है बल्कि उस भाषा के माध्यम से सम्बन्ध जोड़ना है’. कहानीयाँ बच्चों के साथ हमारा वही सम्बन्ध स्थापित करेंगी.

 बचपन में हम कहानियाँ सिर्फ माता-पिता या परिवार से ही नही सुनते थें बल्कि आस-पड़ोस के चाचा, दादा, भैया, दीदी, काकी भी ये कहानियाँ सुनाते-सुनाते कब हमारी अपनी हो जाती थी, किसी बच्चे को आज तक पता नही चल सका. मैं जब अपने बचपन को याद करती हूँ तो मुझे वो रिश्ते याद आते हैं, जो कहानीया सुनते-सुनते ज्यादा प्रगाढ़ हुए थें. बगल वाले गांव से आने वाले चौबे मामा की उन सात बहनों की कहानी जो नदी में डूबकर सात पेड़ बन जाती हैं और उस नदी में कितनी भी बाढ़ आ जाये वो पेड़ कभी डुबता नही था. या फिर घर में पानी भरने वाले रामचंद्र की सुनाई कहानी जिसमें वीर लोरिक एक पहाड़ के दो टुकड़े कर देता है ताकि सदियों तक लोग लोरिक की प्रेम कहानी को याद कर सकें. उन बाबा जी की कहानी भी याद आती है जिन्होने सबसे पहले याज्ञवल्क्य और नचिकेता की कहानी सुनाई थी. उपनिषदों की कहानीयों का महत्व वही पता चला था. मेरे घर से दूसरे गांव में जाते हुए सोन नदी के बीच में वो सात पेड़ या लोरिक के तलवार से कटी वो चट्टान मेरे बचपन में भी वही थी और आज भी वही है. बचपन की सुनी कहानियों ने एक नया ही अनुभव संसार गढ़ा था. जिसमें बहुत सारी कल्पनाये, जादू, रोचकता, सपने बनते-बिगड़ते जीवन के फलसफे थें. ज़िन्दगी के पचीस-छब्बिस सालों के बीत जाने के बावजूद कुछ कहानियों की स्मॄतियाँ अभी बनी हुई हैं तो कुछ कहानीया हूबहु याद हैं. इन कहानियों के भीतर भी न जाने कैसे रिश्ते बनते गये. मेरे अलावा न जाने कितने बच्चों ने ऐसा ही अनुभव संसार बनाया होगा.

आइये हम अपने उस बचपन की दुनिया को फिर से ताज़ा करें चाहे हम शिक्षक हों या पास-पड़ोसी या कोई रिश्तेदार या फिर माता-पिता- सब मिलकर उन बच्चों से एक रिश्ता जोड़ें, एक कहानी सुनाये जो हमारे आस-पास मौजूद हैं.

(अ‍गले किस्त में जारी)

– यह लेख किरण ने लिखा है

EduMentum Cohort ’18: Meet the tribe

Mantra4Change

Beginning their incubation journey this year, Cohort ‘18 brings a mix of cultures, geographies, ideologies, and perspectives. With an average age of 25 years, these young social entrepreneurs are an inspiration to millions.

Let’s take a look at these 11 organizations and their members who form EduMentum’s second cohort.

Samait Shala (2016)   

Samait Shala works on systemic intervention programme in affordable private and government schools. It aims to collaborate and support schools to address learning gaps of students. They work towards creating inclusive classrooms across schools in Ahmedabad, Gujarat.


Bhumi (2006)

One of the largest volunteer-based organization in India, Bhumi is working towards whole school transformation in the affordable private schools in Chennai. They focus on empowering multiple stakeholders in the school to come together and work towards a common vision.


Thrive Foundation (2018) 

Thrive Jyothi Ravichandran

Thrive Foundation looks beyond just teaching and learning in the classroom…

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Welcome!

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“If I can free only one or two villages from the bonds of ignorance and weakness, there will be built, on a tiny scale, an ideal for the whole of India”

Rabindranath Tagore