पुस्तकालय का बच्चों पर बहुत पड़ता है फ़र्क

हमारे समाज में अकसर बच्चों को साहित्य से वंचित रखा जाता है. जिसकी कई वजहें रही हैं. चाहे वो पाठ्य पुस्तकों का भय हो, या अन्य किताबों को पढ़ना समय की फिजूलखर्ची हो जिसका सीधा-सीधा कक्षा या परीक्षा से कोई संबंध नहीं होता, इत्यादि अनेक बाते हैं. लेकिन ऐसी कई बातों से प्रभावित होकर जब हम बच्चों को साहित्य से दूर करते जाते हैं तो उनके मानसिक और बौद्धिक विकास में एक बड़ी रुकावट भी जोड़ते जाते हैं. जिसका प्रभाव उनके पूरे जीवन पर पड़ता है. 

एक समाज में बचपन से ही पुस्तकालय के अनुभव के भरपूर मौके हैं और एक में नहीं हैं- दोनो स्थितियों में किस प्रकार के समाज बनने की संभावना है?    

दो उदाहरण लेकर आगे बढ़ते हैं- 

1. नील गैमन अपने लेख में एक वार्ता का जिक्र करते हैं जिसमें “अमेरिका में निजी जेलों के निर्माण का उद्योग बहुत तेजी से उभर रहा है. अपनी भावी तरक्की की योजना में वे लोग यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि पंद्रह साल बाद कितनी कोठरियो की जरूरत होगी? इसका अनुमान लगाने के लिये उन्होंने बहुत आसान सा तरीका ढूँढ निकाला है: उन्होंने यह पता लगाया कि 10-11 साल की उम्र के कितने बच्चे पढ़ना-लिखना नही जानते हैं. ये ऐसे बच्चे होंगे जो मन बहलाव के लिये नहीं पढ़ेंगे. 

2. कमल किशोर का लेख ‘जादुई कालीन का सफर’ में ढेरों सकारात्मक बातें पुस्तकालय के संबन्ध में मिलेंगी. लेकिन एक जो बड़ी रोचक और सुंदर बात इस पुस्तकालय की वजह से निकलकर आई, वो है: सामाजिक भेदभाव की खाइयों का भरना. किस प्रकार से कुछ जातियों और समुदायों के बच्चे अलग-अलग बंटे हुए थे. जिनका आपसी मनमुटाव था. लेकिन किताबों ने इन बच्चों को एक कर दिया और ‘समुदाय अध्ययन कक्ष’ की शुरुआत हुई . 

ये उदाहरण पुस्तकालय की उपयोगिता या आवश्यकता के बारे में नही बताते हैं बल्कि पुस्तकालय का समाज पर या बच्चों की मानसिकता पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, उसके बारे में कहते हैं. नील गैमन के उदाहरण से समझा जा सकता है कि अपराध और निरक्षरता में महज रत्ती भर का फासला है. लेकिन ऐसा निर्णय भी नही लिया जा सकता कि पढ़े-लिखे लोग अपराध नही करते. लेकिन इन बातों में एक ठोस संबन्ध जरूर दिखता है. 

साहित्य पढ़ते हुए मनुष्य सुख-दुख, हंसी मजाक, प्रेम, घृणा न जाने कितने अनुभवों से गुजरते हुए जाने-अनजाने अपने भावनात्मक गुणों के अत्यंत निकट पहुंचता है. बर्लिन में नाजीवाद के दौर में जब बड़ी मात्रा में किताबें जलाई गई थीं, तो शायद उसका उद्देश्य भी यही था कि साहित्य की वजह से जो भावनात्मक विकास होता है, उसे खत्म कर दिया जाये, लोगों को युद्ध के लिये मजबूत और सबल बनाया जाये. 

इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जो पुस्तकालय या पुस्तक संस्कृति को नष्ट करने के पक्ष में थें. पुस्तकें जलाने, नष्ट करने या न पढ़ने देने का मकसद सिर्फ लोगों को युद्ध जीतने या शारिरिक रूप से मजबूत बनाने के लिये ही नही था. बल्कि ऐसी संस्कृति को नष्ट करना था, जहाँ मनुष्य को अपना इतिहास बोध हो, किसी विषय या सत्ता पर प्रश्न उठाना, उस स्वतंत्रता और आत्मविश्वास को खत्म करना भी था जहाँ किसी के विचार समृद्ध हों रहे हों. 

जाहिर सी बात है कि पुस्तक संस्कृति कई प्रकार से समाज के बीच क्रांति लाने का काम करती है. एक तरफ उस समाज को अपनी बात कहने की तहज़ीब सिखाती है, तो दूसरे की बात सुनने का धैर्य भी देती है. ऐसी संस्कृति में रहने वाले बच्चे या बड़े काफी हद तक संवेदनशील बनेंगे और एक संवेदनशील समाज कभी भी किसी हथियार बनाने, युद्ध करने या संप्रदाय विशेष के प्रति कटु होने के पक्ष में नही होगा. 

इतिहास से गुजरते हुए हम जब उस समाज की तरफ जाते हैं जहाँ बचपन से ही पुस्तकालय के अनुभव हों. तो हम कुछ बातें निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि वे बच्चे वैचारिक स्तर पर ज्यादा समृद्ध होते हैं, जिनका बचपन पुस्तकालय का प्रयोग करते हुए गुजरा है. ऐसे समाज में प्रश्न करने की आज़ादी होती है. एक दूसरे की सहमति-असहमति का सम्मान करने की परंपरा आगे बढ़ती है. 

चूंकि पुस्तकालय की व्यवस्था लोकतांत्रिक व्यवहार करते हुए बच्चों को अवसर मुहैया कराती है जहाँ वे स्वतंत्र होकर अपनी इच्छानुसार कुछ भी पढ़ सकते हैं. उसके बाद सोचने की, विचार करने की, किसी किताब को अपनी तरह से व्याख्या करने, समझने, कल्पना करने और उसपर अमल करने या न करने की आज़ादी भी यहाँ है. यह वातावरण भी बच्चों के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीज बोना शुरु कर देता है और आगे चलकर व्यवहारिक स्तर पर जीवन में भी बच्चे लोकतंत्र की गरिमा को समझते हुए सामाजिक रूप से जिम्मेदार होंगे. 

पुस्तक संस्कृति कई तरह के जीवन मूल्यो का विस्तार कर उस समाज को संतुलित करेगी. 

एक संतुलित समाज अपने आस-पास के प्रति संवेदनशील और जागरूक होगा. जहाँ कई प्रकार की विविधता चाहे जीवन शैली, धर्म, खान-पान कुछ भी हो व्यक्तिगत चुनाव पर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न नही होगा. व्यक्ति विशेष या समुदाय का सम्मान होगा. 

साहित्कयकार अशोक वाजपेयी कहते हैं , “पुस्तकें हमारे अकेले भौतिक जीवन का विस्तार कर उसमें कई और जीवन महसूस और शामिल करने का अवसर देती हैं, वे बताती हैं कि मनुष्य बहुलता से ही इतिहास में सदियों के पार जीवित रहा है और स्वयं भारतीयता इस असमाप्य मानवीय बहुलता का निरंतर चल रहा उत्सव है. हम पुस्तकों से ही जान पाते हैं कि हममें और दूसरों में कोई बुनियादी फर्क अंततः नहीं है, हम ही वे हैं और वे भी हम हैं.” पुस्तक पढ़ने वाला समाज यह बखूबी समझ सकता है. 

लेकिन जिस समाज में पुस्तकालय का वातावरण नही है वे एकांगी विकास की प्रक्रिया में ही आगे बढ़ते हैं. हो सकता है कि वे आर्थिक रूप से कुछ हद तक एक समृद्ध समाज बन जाएँ लेकिन जीवन जीने के जो विभिन्न दृष्टिकोण हैं उससे वह वंचित हो जायेंगे. 

कहानियां या कविताएं सिर्फ शब्दों का संयोजन भर नही हैं बल्कि उनसे गुजरते हुए मनुष्य कई जीवन अनुभवों को महसूसता है, उन घटनाक्रमों की पड़ताल करता है, जो किसी मोड़ पर उसे विचलित करती हैं. इस अनुभव से वंचित समाज अपने आस-पास की पीड़ा, किसी का अस्तित्व या विश्वास को उस तरह से स्वीकार ही नही कर पायेगा जिस तरह से वो खुद के विश्वासों पर यकीन रखता है. 

ऐसे समाज में सहनशीलता या धैर्य की गुंजाइश जरा कम ही होगी. स्वाभाविक ही है कि इस तरह के समाज में कल्पनाशीलता का अभाव होगा जो कि किसी भी समाज की तरक्की में बाधा है, चाहे वह विकास बौद्धिक हो, वैज्ञानिक हो, राजनितिक हो या फिर आर्थिक हो.      

यह लेख आजतक की वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है। उपक्रम की सह – संस्थापक किरण ने लिखा है।

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