उपक्रम से पहले और उपक्रम के साथ अब तक का सफ़र

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जिन दिनों मेरा स्कूल जाना शुरु हुआ, ज्यादातर बच्चों की तरह मै भी स्वभाव से बहुत चंचल थी। पर वह चंचलता शुरुआती दो कक्षाओं l.k.g और u.k.g के बाद से धीरे-धीरे खो गई।  वजह बना ‘डर’। हर समय शिक्षक मुझसे ऐसे प्रश्न पूछते जिनका जवाब मुझे नही आता था। उसके बाद या तो पिटाई होती या फिर ढेर सारा अपमान।  मैं हिम्मत नहीं जुटा पाती थी, कि यह पूछ सकूँ, मैडम, मे आई गो टू टॉयलेट? मैंने बैठे-बैठे ही पेशाब कर दिया। कक्षा एक तक पढ़ने के लिए मुझे किसी शिक्षक पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि मम्मी मुझे संभाल लेती थीं। लेकिन धीरे-धीरे सामाजिक विज्ञान  और विज्ञान क्या होता है, मेरी समझ के परे हो गया। पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि मैडम ये (जो मुझे ब्लैकबोर्ड से देख कर  कॉपी में लिखना था) किस कॉपी में लिखना है? मैं नहीं चाहती थी कि किसी भी शिक्षक की नज़र मुझ पर या मेरी कॉपी पर पड़े और मुझे डाँट या मार पड़े। मुझे यह स्वीकार नहीं था कि कोई मुझे कमजोर समझे। लेकिन इस बात का भी दुःख अलग से था कि कोई मुझपर ध्यान नही देता। मुझे एक्स्ट्रा अटेंशन की जरूरत थी और आज भी कहीं न कहीं यही इच्छा है। घर में आने वाले मेहमान हमेशा स्कूल और पढ़ाई के संबंध में पूछताछ करते थे। कभी इसकी स्पेलिंग कभी उसकी स्पेलिंग एक तरह से जंग छिड़ी होती थी कि कब तक तुम जवाब दे पाती हो।  मुझे भी हार बर्दाश्त नहीं थी। दोनों ही अपने अपने ज्ञान की सत्ता कायम करने पर लगे होते थे।

 जब आप स्कूल बदलते है तो वहाँ ये परीक्षा और भी कठिन हो जाती है जैसे कि अच्छा तो तुम इंग्लिश मीडियम स्कूल से हो। तुम सब इंग्लिश में करो और जब हिंदी लिखने में मात्रा की गलती हो तब तो  नए  शिक्षकों के लिए एक सुनहरा अवसर होता था कि यही सिखाया गया है तुम्हारे स्कूल में। इसका प्रभाव मेरे आत्मविश्वास और व्यवहार पर पड़ा मैं लोगो से बचने लगी, अपनी बात कहने में मुझे बहुत कठिनाई होती। जैसे-जैसे लोगो के सम्पर्क में आती गयी उनके व्यवहार ने मुझे यह मानने पर विवश कर दिया कि मुझे किसी से बात नही करनी मुझे किसी के संपर्क में नही रहना है। मैंने अपनी दुनिया अपने घर के ही अन्दर सीमित कर ली। जहाँ पर मुझे ये विश्वास दिलाया जाता कि मैं जैसी भी हूँ, अच्छी हूँ।

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 बी. एड करने के बाद मैंने पढाई छोड़ दी और 5-6 महीने घर पर बैठ गई। इस दौरान मेरे  सिर्फ तीन काम थे: खाना, सोना, सोचना कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे मुझे ख़ुशी मिले,   जहाँ मै सहजता से रह सकूं। मुझे यह विचार पहले कभी नही आया कि शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के साथ काम करना है।  एक दिन बिना कुछ सोचे समझे ही, उपक्रम के काम के बारे में जाने बिना बस समय पर सब कुछ छोड़ते हुए उपक्रम की एक कार्यशाला में सम्मिलित हुई जो भारतीय विद्या मन्दिर के शिक्षकों के साथ आयोजित की गई थी। उस कार्यशाला में सपनों के स्कूल पर चर्चा हुई। उस दिन ऐसा लगा जैसे मेरे सपनों का स्कूल यहीं-कहीं है,  जहाँ बच्चों को सहज वातावरण मिल सके। इसके बाद उपक्रम के ऑफिस में हम लोग रोज शिक्षा के विभिन्न आयामों पर गहरी चर्चा करते थे/हैं। यह धीरे-धीरे मुझे शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रेरित करने लगा।

 सबसे पहले मैंने क्लास ऑब्जरवेशन किया और रिपोर्ट बनाया, इस एक-डेढ़ महीने के दौरान मेरा अनुभव सामान्य था। जब भी कोई क्लास खाली दिखती तो मैं बच्चों के साथ बातचीत करने लगती। कक्षा तीन में पहली बार बच्चों के बीच मैं एक खेल के साथ गई। उस समय तक हम एक- दूसरे से अपरिचित थें। मेरे मन में सिर्फ सवाल ही सवाल थें। मैं सोच रही थी कि अपनी बात इनको समझा भी पाऊँगी या नहीं। इनको मेरे साथ खेल कर मज़ा आएगा कि नहीं। मैंने उन्हें खेल के नियम बताये और खेल शुरू हुआ। दस मिनट के भीतर हम एक -दुसरे के साथ कैसे घुल मिल गये पता ही नहीं चला। बच्चे अपनी बात को दृढ़ता से रखने लगे ऐसे नहीं, यहाँ नहीं, मैं यहाँ खड़ा रहूँगा| बिलकुल जादू के जैसे मेरे सारे सवाल सारी सोच एकदम से गायब हो गयी और अब सिर्फ मज़ा आ रहा था। उनके साथ जैसे मेरा बचपन लौट आया था। अवसर मिलते ही उनकी ढेर सारी बातों और अनुभवों को सुनना, अपने बचपन कि यादों को उनके साथ साझा करना, उनके साथ गाना गाना मुझे अच्छा लगने लगा | लगभग हफ्ते भर की मुलाकात में ही हम अच्छे दोस्त बन गये। जब मैं क्लास प्रैक्टिस में एक लेसन प्लान के साथ गयी तब उनके साथ इतनी आत्मीयता हो चुकी थी कि वो मेरे साथ पाठ पढ़ने के लिये आसानी से तैयार हो गये।

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 अब एक दिन भी उन बच्चो के पास न जाऊं तो कुछ अधूरा सा लगता है। आज मेरा अनुभव पहले की बातों से बिल्कुल अलग है। मैं सोचती थी कि बच्चों को संभाल नही सकती जबकि सही बात तो यह है कि बच्चों को कुछ सिखाना या संभालना नही पड़ता। वो तो बहुत कुछ जानते हैं, जो हम नही जानते। उनकी कल्पनाओं का कोई दायरा नही होता। अगर उन्हें मौका मिले तो दुनिया आविष्कारकों से भर जाये। वे बेहद सृजनशील होते हैं। बेफिक्र हो कर अपनी बात कहते हैं। वे कुछ बेहतर करना चाहते हैं। अगर कमी या देरी है तो इस बात की कि हम उन्हें समझें-सुनें और उन्हें मौके दें सरल और अनोखे संसार को गढ़ने के ताकि कोई अन्य बचपन डरा-सहमा न हो। मैं उपक्रम को धन्यवाद देना चाहती हूँ, मुझे इतने सुन्दर बच्चों के संसार में ले जा कर उसे अनुभव करने का मौका देने के लिए। मात्र पांच महीनों के भीतर मेरी दवाइयों को कम करवाने के लिये। मेरा खुद से परिचय करवाने के लिए।

– यह लेख अंजली ने लिखा है

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