उन कहानीयों का रंगबिरंगा संसार

A girl running away from a cloud of waste

चंपावत और दिल्ली में काम करते हुए बच्चों को कहानी सुनाना एक जरूरी काम जैसे था. आठ सितम्बर दो हज़ार अठारह . जब पूरे एक साल बाद बच्चों के बीच मुझे कहानी सुनाने के लिये जाना था. थोड़ी घबराहट और ज्यादा खुशी अंदर ही अंदर किसी खरगोश की तरह उछाल मार रही थी. डर लग रहा था, इतने दिनों बाद बच्चों के साथ जुड़ना होगा लेकिन पता नही बच्चों को मेरा कहानी सुनाना पसंद आयेगा या नहीं. खुशी इस बात की भी थी कि इस क्रम में मेरा वह स्कूल भारतीय विद्या मंदिर भी था जहाँ मैंने ज़िन्दगी का पहला सबक सीखा.

मेरा पहला पड़ाव था, प्राथमिक विद्यालय, परासपानी सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) जहाँ बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी कहानी सुनने का इंतज़ार कर रहे थें. खास बात इस स्कूल की यह थी कि सभी बच्चे आदिवासी समुदाय् से आते हैं. यहाँ कक्षा चौथी और पाँचवीं के पैसठ बच्चे थें. सबसे पहले बच्चों को अपना परिचय देते हुए मैंने उनसे पूछा कि आप लोग कहानीं तो रोज सुनते होंगे. मेरे विश्वास के उलट उनका जवाब ना में आया. मैंने ‘कचरे का बादल’ कहानी सुनाई. यह एक ऐसी बच्ची की कहानी थी जो हमेशा गंदगी फैलाती रहती थी, कहानी शुरु करने से पहले मैंने कहानी का परिचय दे दिया था. कहानी के बीच-बीच में बातचीत भी होती रही, ताकि बच्चों की भी भागीदारी बनी रहे लेकिन बच्चे ज्यादा से ज्यादा हाँ या ना में ही जवाब देते थें. इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन दो मुख्य कारण जो मुझे समझ आया वो था- मेरा पहले से इन बच्चों के साथ कोई परिचय न होना. दूसरा, की ये बच्चे ऐसे गांव से थें जहाँ पूरे साल में शायद ही बच्चे दो-तीन बार से अधिक बाहर के अन्य लोगों से मिलते-जुलते होंगे या वे कहीं बाहर भी जाते होंगे. इन सबके बावजूद बच्चों को कहानी अच्छी लगी और बच्चों ने अपने टीचर के माध्यम से मुझे फिर आने को कहा.

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परासपानी विद्यालय से निकलने के बाद अब मैं उस जगह की यात्रा पर थी, जहाँ से मेरे स्कूल के दिन शुरु हुए थे. भारतीय विद्या मंदिर, डाला सोनभद्र जो परास पानी गांव से लगभग सात किलोमीटर दूर था. जहाँ मेरी पहली पाठ्य पुस्तक पढ़ने की शुरुवात हुई थी. उन दिनो को याद करते हुए बहुत सारी यादें धुँधली पड़ गई थी. अब तो कोई भी पुराना शिक्षक या स्कूल स्टाफ नहीं रहा. लेकिन बच गया था स्कूल का वही पुराना नियम जो मेरे नजर में कभी भी घिसा-पिटा नही हो सकता. जिसने न जाने कितने गरीब बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाया और जहाँ आज भी करीब अस्सी प्रतिशत बच्चे फीस नही दे पाते हैं. लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा अभी भी स्कूल सम्भाल रहा है. इस स्कूल में डाला और आस-पास की बस्ती के बच्चे आते हैं. सिर्फ दस मिनट में न जाने कितनी कल्पनाओं ने ताना-बाना बुनना शुरु कर दिया था. स्कूल में सबसे पहले मैं प्रिंसिपल ऑफिस गई और थोड़ी बातचीत के बाद हम लोग उस कक्षा की तरफ बढ़ें जहाँ बच्चे हमारा इंतज़ार कर रहे थे. प्रिंसिपल ऑफिस से उस कक्षा की दूरी तय करने में मुझे हर एक कक्षा के बाहर ढेरों कचरा मिला, उसमें से कुछ चीजें उठा ली और उस कक्षा में टेबल के उपर सजा दिया. उसी कचरे के माध्यम से कहानी की भूमिका बनानी शुरु कर दी. फिर बच्चों को कहानी सुनाई. यहाँ भी बीच-बीच में बच्चों से बातचीत और सवाल-जवाब चलता रहा. लेकिन मजे की बात ये थी कि यहाँ के सभी बच्चे पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बने रहे. परास पानी गांव के उलट यह स्कूल बाज़ार में है, जहाँ आते-जाते बच्चों पर वहाँ हो रही गतिविधियों का भी असर पड़ता होगा. खैर, कहानी ख़त्म होने बाद जब बच्चों को मैंने ये बताया कि मैं भी इसी स्कूल से पढ़ी हूँ तो बच्चे बहुत खुश हुए. और मुझे हर रोज स्कूल में आने और कहानी सुनाने के लिये कहा.

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इस थोड़ी देर की मुलाकात ने बच्चों और शिक्षकों से जुड़ने में मेरी मदद की. दो दिन बाद ही दोनो स्कूल के शिक्षकों ने फोन करके अपने स्कूल में आने का फिर से न्यौता दिया. बच्चों के लिये ये एक नया अनुभव था. मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में पढ़ती थी तब कभी-कभार कोई शिक्षक नैतिक शिक्षा की किताब से कोई प्रेरणास्पद कहानियाँ सुना देता था, ताकि उसे समझकर प्रश्नों के उत्तर दिये जा सके. लेकिन इन कहानियों के माध्यम से बच्चों से जुड़ा भी जाये ऐसी कोई मंशा रही होगी, बहुत याद करने के बाद भी कुछ याद नही आता. लेकिन इन दोनों विद्यालयों के इस अनुभव के बाद और अन्य लोगों से बातचीत करने के बाद समझ आया कि कहानीयों के सुनने-सुनाने का प्रचलन गायब हो गया है, तब बड़ा ही दुख और आश्चर्य होता है. ऐसा लगता है कि हम सबने बच्चों को उस द्वीप की तरह अकेला छोड़ दिया है, जहाँ कभी-कभी किसी खास मौसम में ही यात्री आते हैं और छुट्टियाँ मनाकर उसपर कुछ कचरा छोड़ वापस चले जाते हैं. उनका उस द्वीप से न कोई लगाव होता हे और ना ही कोई संवाद. जब मुझे पता चला कि प्रथम बुक्स आठ सितम्बर यानि विश्व साक्षरता दिवस वाले दिन अलग-अलग जगहों पर हर साल लोगों को स्वैछिक रूप से तैयार करता है कि वे जहाँ भी हैं वहा के बच्चों को कहानी सुनाये तो मुझे ये कहानी वाली अवधारणा ही बड़ी रोचक लगी. दरअसल ये अवधारणा सिर्फ कहानी सुनाने तक सीमित नही है बल्कि उस कहानी के माध्यम से बच्चों के साथ एक सम्बन्ध भी जोड़ना है जो कही धीरे-धीरे खो सा रहा था. शिक्षाविद डॉक्टर कॄष्ण कुमार अपने एक व्याख्यान में कहते हैं कि ‘बच्चों को भाषा सिखानी नही है बल्कि उस भाषा के माध्यम से सम्बन्ध जोड़ना है’. कहानीयाँ बच्चों के साथ हमारा वही सम्बन्ध स्थापित करेंगी.

 बचपन में हम कहानियाँ सिर्फ माता-पिता या परिवार से ही नही सुनते थें बल्कि आस-पड़ोस के चाचा, दादा, भैया, दीदी, काकी भी ये कहानियाँ सुनाते-सुनाते कब हमारी अपनी हो जाती थी, किसी बच्चे को आज तक पता नही चल सका. मैं जब अपने बचपन को याद करती हूँ तो मुझे वो रिश्ते याद आते हैं, जो कहानीया सुनते-सुनते ज्यादा प्रगाढ़ हुए थें. बगल वाले गांव से आने वाले चौबे मामा की उन सात बहनों की कहानी जो नदी में डूबकर सात पेड़ बन जाती हैं और उस नदी में कितनी भी बाढ़ आ जाये वो पेड़ कभी डुबता नही था. या फिर घर में पानी भरने वाले रामचंद्र की सुनाई कहानी जिसमें वीर लोरिक एक पहाड़ के दो टुकड़े कर देता है ताकि सदियों तक लोग लोरिक की प्रेम कहानी को याद कर सकें. उन बाबा जी की कहानी भी याद आती है जिन्होने सबसे पहले याज्ञवल्क्य और नचिकेता की कहानी सुनाई थी. उपनिषदों की कहानीयों का महत्व वही पता चला था. मेरे घर से दूसरे गांव में जाते हुए सोन नदी के बीच में वो सात पेड़ या लोरिक के तलवार से कटी वो चट्टान मेरे बचपन में भी वही थी और आज भी वही है. बचपन की सुनी कहानियों ने एक नया ही अनुभव संसार गढ़ा था. जिसमें बहुत सारी कल्पनाये, जादू, रोचकता, सपने बनते-बिगड़ते जीवन के फलसफे थें. ज़िन्दगी के पचीस-छब्बिस सालों के बीत जाने के बावजूद कुछ कहानियों की स्मॄतियाँ अभी बनी हुई हैं तो कुछ कहानीया हूबहु याद हैं. इन कहानियों के भीतर भी न जाने कैसे रिश्ते बनते गये. मेरे अलावा न जाने कितने बच्चों ने ऐसा ही अनुभव संसार बनाया होगा.

आइये हम अपने उस बचपन की दुनिया को फिर से ताज़ा करें चाहे हम शिक्षक हों या पास-पड़ोसी या कोई रिश्तेदार या फिर माता-पिता- सब मिलकर उन बच्चों से एक रिश्ता जोड़ें, एक कहानी सुनाये जो हमारे आस-पास मौजूद हैं.

(अ‍गले किस्त में जारी)

– यह लेख किरण ने लिखा है

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